बेचारी बेरोजगारी की अधूरी हसरत - राजेश कुमार कौशल

 

बेचारी बेरोजगारी की अधूरी हसरत - राजेश कुमार कौशल

Apr 23, 2024 | कविताएं - शायरी - ग़ज़ल | राजेश कुमार कौशल |  👁 10,455


शबनम की बूंदों से अतृप्त ,
पिपासा बुझाने जा रही थी,

गली मोहल्ले गांव शहर में,
बेचारी ठोकरें खा रही थी,

दो जून रोटी के जुगाड में,
वो दुखी मन से जा रही थी ,

शिक्षा काबिलियत के प्रमाण ,
सीने में दफनाए जा रही थी ,

चलते 2 पत्थर की ठोकर से,
वो सबक सीखे जा रही थी ,

गर्दिशों को चुनौती देने की ,
बात उसे समझ आ रही थी,

स्वार्थपरायण जहरीली नागिन,
निर्लज्ज राजनीति सता रही थी ,

चुनावी वायदे रोजगार सृजन के,
वो सहज भुला नहीं पा रही थी ,

छलिया गुडिया जहर सी पुड़िया,
बोटबैंक राजनीति समझा रही थी,

रोजगार रोटी कपड़ा सेहत मकान,
मौलिक अधिकार हो ,चिल्ला रही थी,

हसरत अधूरी ही रही उसके मन की ,
बेचारी बेरोजगारी ऐसे कराह रही थी !


----राजेश कुमार कौशल
[हमीरपुर,हिमाचल प्रदेश]


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