बेबाक देखता रहा - वर्षा शिवांशिका

 

बेबाक देखता रहा - वर्षा शिवांशिका

Apr 05, 2024 | कविताएं - शायरी - ग़ज़ल | लिखन्तु - ऑफिसियल |  👁 17,818


सफ़र पर आगे बढ़ने,
चुनी नई सड़क मैंने,
भूला कर रंज़िश अपने ,
नया मोड़ लिया तपने I

चलते ख़ुद को तपाया ,
कभी द्रवित न होने दिया ,
सहनशक्ति से बढ़ते चला,
सड़क से मोड़ लेते रहा I

ओले-आँधी.धूप-कोहरा,
सब झेला,सामना करता रहा ,
जीवन के डगर पर सब सहा ,
बिना रुके चलता ही रहा I

मंजिल पाने की होड़ के लिए ,
बहुत रिश्ते अपने बिगड़ गए ,
छूट गए जो साथ चल न पाए,
वे कहीं बादलों में छिप लिए I

क्या खिलौना बन रहा गया ?
क्या मर्जी से मैं चला पाया ?
मिला क्या वही सच हो गया ?
सड़क,बेबाक देखता रह गया I

वर्षा शिवांशिका
कुवैत


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