अपना लगा है तू - अशोक कुमार पचौरी

 

अपना लगा है तू - अशोक कुमार पचौरी

Jul 07, 2018 | कविताएं - शायरी - ग़ज़ल | अशोक कुमार पचौरी 'आर्द्र' |  👁 914,136

अपना लगा है तू

हाथ बढ़ाया है

तुझको पता है

सीने से लगाया है

सीने से लगाकर तुझे

दिल मैं बसाया है

मेरे ये जो नगमे हैं

मेरी यह जो बातें हैं

उनसे हसीन तो

सपनो की रातें हैं

सपने सुहाने थे

तेरे दीवाने थे

जगमग जगमग

सपनो की रातों मैं

हर पल रहता था

तेरी ही बाँहों मैं

बाहें थी तेरी

छाँव हो पीपल की

नदिया की धारा हो

बहती हुई सी कोई

मस्त हवा हो जैसे

घुमड़ घुमड़ के

गाये बादल

रिमझिम रिमझिम

बरखा बरसे हो

टिप टिप गिरती

ओस की बूँदे

धुआं धुआं सा

छाये कोहरा

कोहरे में देखूँ तो

कुछ भी न दिखता है

एक तेरा चेहरा है

एक तेरी बातें हैं

आँखों मैं समाया चेहरा

और गूंजे हैं बातें

कानों में मेरे

बिजली के जैसे

उजली हुई सी

धुप के जैसे

मखमली बदन तेरा

चमके है

चाँद भी जैसे

शर्माता है

देखके गोरा

चेहरा तेरा

नजरो की बातें हैं

नजरे ही जाने हैं

दिल भी तो तुझको

अपना ही माने है

नजरे मिली हैं तेरी

ख्वाब बुने हैं मेने

आती हो जैसे

ख्वाबों में मेरे

घर पे भी आओ इन्तजार है

हमको सनम तुमसे ही प्यार है

हमको सनम तुमसे ही प्यार है


Comments

Popular posts from this blog

पुष्पाणि सुगन्धिनि - अशोक कुमार पचौरी